सम्बंध

सम्बंध… रिलेशनशिप ये वो शब्द है जो हमारे इस दुनिया में आने से पहले हमसे जुड़ जाता है और हमारे जाने के बाद भी ये हमसे जुड़ा रहता है, पूरे जीवन हैम कुछ भी कर रहे हो, बस इसी शब्द के साथ हर पल बिताते हैं!!!

सम्बंध के अंनत स्वरूप है, लेकिन आज मैं जिस पर लिखना चाह रहा हूँ अपने विचार प्रकट करना चाह रहा हूँ वो हमारे सामान्य जीवन का अति महत्वपूर्ण अंग है, सम्बंध पति पत्नी के, तो चलते है इस सफर पर मेरे नजरिये और प्रेणा से।

बात शुरू करता हूँ एक महान संत कि एक छोट सी पढ़ी कहनीं से, एक बार एक संत अपने घर के बाहर दोपहर को बैठे कुछ कार्य कर रहे थे, तभी एक महिला अपनी परेशानी लिए आती है, कहती है हे पूज्य देव मेरे परिवार में मेरी और मेरे पति की नही बनती… हममें अक्सर विवाद हो जाता है, क्या है समाधान इसका कृपया मार्गदर्शन करें, उस संत ने लगभग उनकी बातों को अनसुना करते हुए अपनी पत्नी को आवाज़ दी, “सुनती हो जरा दीपक ले आना”, कुछ समय उपरांत उनकी धर्मपत्नी दीपक ले कर आ गयी, संत ने दीपक लिए फूंक मारी बुझा दिया और वापस पत्नी को दे दिया, उनकी पत्नी से बुझा दीपक लिया और बड़े शांत मन से चली गयी, अब संत ने अपना कार्य रोक, और उस महिला से कहा, क्या देखा?? महिला बड़ी थोड़ी नाराज सी अवस्था में बोली हे देव जब आप को दीपक का काम नही तो अपबे अपनी पत्नी को क्योँ काष्ठ दिया, पता नही वो किस काम में व्यस्त हो और आप की आवाज सुन के वो काम छोड़ आप के लिए दीपक ले कर आई और आप ने उसे फूक मेरी और बुझा के वापस दे दिया क्या ये उचित वयवहार है, और आप ने मेरी परेशानी तक को नही सुना न समाधान दिया!!!!

अब उस पूज्य संत ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम्हारी ही समस्या का निदान दिया है तुम्हे, जब मैंने अपनी पत्नी से कहा दीपक ले आओ हो सकता है वो कोई अनिवार्य कार्य कर रही होगी, या हो सकता है कार्य से थक के आराम को गयी हो, लेकिन मेरे आवाज लगतार की दीपक ले आओ, वो तुरंत दीपक को रौशन कर के लर आयी, “क्योँकि उसे पूर्ण विश्वाश था, की मैन उस से दीपक किसी विशेष कार्य को लाने को कहा होगा”, “जब मैंने दिया को बुझा दिया तब भी उसे मुझ पर पूर्ण विश्वाश था कि जिस विशेष प्रयोजन से उसे दीपक के साथ बुलाया था वो पूर्ण हो गया” और वो वापस उसी विशवास और प्रेम के साथ जा कर अपने उस कार्य मैं लग गयी जिसे वो छोड़ जे आयी थी, यही विश्वाश एक पति पत्नी होना चाहिए, जब ये विश्वाश होगा वह प्रेम भी होगा और शांति भी।

क्या क्या हम अपने जीवन में अपने पति या पत्नी पर इतना विश्वश करते है??? या सिर्फ एक दूसरे को कैसे धोखा दे इसके लिए प्रयासरत रहते है, और फिर वहां से शुरू होते है पति पत्नि के जोक्स, उसमें पड़ोसन को लाया जाता है, और वहाँ से हमारी मानसिकता पर प्रहार होता है, एक ऐसा रिश्ता जिसके साथ धर्म जुड़ा है, धर्मपत्नी… मतलब जीवन में सबसे बड़ा धर्म और पति पत्नी का धर्म एक दूसरे के प्रति??? आज सिर्फ जोक्स बन कर राह गया है, रोमान्स सिर्फ कुछ दिन रहता है लेकिन विश्वश ऐसी चीज है जो जीवन पर्यन्त रहती है… आज खुद से पूछे आप को पूरी दुनिया के लिए नही लेकिन क्या आप अपनी पत्नी के लिए वो संत हो पाए है क्या, क्या आप अपने पति के लिए वो पत्नी बन पाई है क्या??? की सिर्फ आधुनिकता में खुद को और अपनी पत्नी को सिर्फ रोज नए नए तरीके से धोखा देने का प्रयत्न कर रहे है, धोखा सिर्फ चारित्रिक नही होता हमारे दिनचर्या के हर कार्य मैं हो सकता है।

विचार आप को करना है पति पत्नी के भद्दे जोक्स पर हस रहे है आप या आप खुद पर, भाभी जी घर पर है से कही आप बेवजह अपने चरित्र का पतन तो नही कर रहे है, कही आप अतिवादी मानसिकता के गुलाम तो नही होते जा रहे है…

अंतिम वाक्य लेकिन महत्वपूर्ण, विवाह हमारे समाज की सबसे मजबूत नींव थी, जिसे आज तक भी कोई हिला नही पाया, लेकिन ऐसा ही रहा तो क्या ये इतनी मजबूत रहेगी, जो सात जन्मों का बंधन होता था, आज कड़वाहट और इस्थिति अलग होने तक आ गयी, क्योँकि हमने वही विवाह को कॉन्ट्रेक्ट मान लिया, शारीरिक सुख का… एक घर में रहते हुए भी हम में कोल्ड वॉर चलता रहता है, क्योँ क्योँकि हम अंदर से इतनी कुपोषित और खुद से नाराज है क्या देंगे अपने जीवनसाथी को, सोचना कही तुम्हारा रिस्ता भी सिर्फ शारीरिक ही बन के राह गया है?????

महिला दिवस

जय श्री कृष्ण राधे राधे… आप सभी लोगो का स्वागत और अभिनंदन है, श्री मद भगवद गीता में, आज आप सब तो टाइटल पढ़ कर आये है, वो सही है, बिल्कुल सरल तरीका बताऊंगा, कैसे यश कीर्ति और धन कि प्राप्ति करें।

आज 8 मार्च वर्ल्ड वीमेन डे है, सभी श्री शक्तियों को मेरा नमन… हमारे भारतीय समाज में ऐसी कोई परमपरा नही है, उसका कारण है, संस्कार को हम किसी एक दिन तक सीमित नही करते है, और ये पश्च्यात संस्कृति का फायदा भी, की जो हमारे मूल संस्कार है, जिनसे हम दूर होते जा रहे है, कम से कम उस एक दिन उनको याद कर कर के पुनः अपने मूल में वापस आये।

कैसे दूर करे धन अभाव, कैसे अपना यश और कृति बढ़ाये… सिर्फ वक तरीका है और है महिला सम्मान, कैसे इसको जीवन में उतारे और, किस प्रकार ये हमारे जीवन को प्रभावित कर के हमे यश कीर्ति और धन धान्य की ओर ले जाती है, कुछ उद्धरण लेते है

पहला उद्धरण श्री राम कथा रामायण से लेते है, रामायण की कहानी सब को पता है, श्री राम को वनवास हुआ, और माता सीता का हरण कर के रावण, सोने की लंका में ले जाता है, मेरी कहानी यही से परम्भ होती है, अच्छा रावण जब तीनो लोक को जीत चुका था, सोने की लंका बनवा रखा था, रावण का भय हर जगह व्याप्त था, वो अम्रत का पान कर चुका था, मतलब अमर था, सब कुछ था उसके पास फिर क्या जरूरत थी उसको माता सीता का हरण करने की, और जब हरण किया तो उसने क्योँ नही किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या शक्ति प्रयोग किया माता सीता के प्रति, क्योँ लंका की सबसे सुंदर इस्थान लंका में रखा, क्योँ, क्या सोचा है इस बारे में???

रावण ने ऐसा इस लिए कुछ नही किया क्योँकि वो ब्राह्मण था, यहाँ ब्राह्मण से मेरा आशय, ज्ञानि का है, वो परम ज्ञानी था, सब कुछ प्राप्त करने के भी बाद, तीनो लोक जितने के भी बाद उसके पास अभी तक विष्णु लोक नही था, ब्रह्म लोक नही था, ये वो इस्थान है, जो अनंत के परिभाषाक है, तीनो लोक का अंत तो है लेकिन विष्णु लोक का नही, वो अनंत है चिर है, इस्थाई है, रावण जनता था माता सीता माँ लक्ष्मी का अवतार है, और सिर्फ माँ लक्ष्मी की कृपा से वो वो अनंत कीर्ति पा सकता था, रावण ने बहुत प्रयास किया कि माता उसे एक नज़र देख भर ले, वो अपने प्रयोजन में सफल हों जाएगा…

रावण के पतन का कारण भी यही था, माता लक्ष्मी का माता सीता का ह्रदय विदीर्ण कर देना, मन दुखा देना, जब लक्ष्मी आप पर प्रश्न होती है, आप को सब कुछ खुद ब खुद मिल जाता है, लेकिन जब उनका कोमल हृदय क्रोध या मलिनता से ग्रषित होता है तो कुल तक का सर्वनाश हो जाता है, यही हुआ अम्रत का पान करने वाले रावण का भी, उसका दोष सिर्फ इतना था माता सीता की इच्छा के विरुद्ध उसने ये कार्य किया और, अपना नाश किया, विजय उसी की होती है जिस पर माता लक्ष्मी की दृष्टि होती है।

दूसरी कहानी मेरी महाभारत से है, विश्व का सबसे बड़ा युद्ध और सम्पूर्ण विरो से पृथवी खाली हो गयी उन 18 दिनों में, इस युद्ध का भी परम्भ इस्त्री अपमान से हुआ, द्रोपदी कुल वधु, श्री शक्ति स्वरूप इस्री का अपमान भारी सभा में, और परिणाम क्या रहा सम्पूर्ण कुल का नाश…

इसके प्रतिउत्तर श्री राम मर्यादा पुरषोत्तम राम बने, और पाण्डवा कि कीर्ति अनंत हुई, इसके पर एक और उद्धरण, श्री राम भक्त हनुमान को, माता सीता का वरदान, अष्ट सिद्धि नाव निधि के दाता अस वर दीन जानकी माता, माँ आप पर प्रसन्न हो जाये तो वो एक पल में वो वरदान दे देती है, उसकी दाता बना देती है जिसको पाने की कामना, देवता तक करते और उनके लिए भी दुर्गम है।

श्री का मतलब जानते है आप सब, श्री का सम्बोधन माता लक्ष्मी से है, और यही श्री जब किसी के नाम के आगे लग जाती है तो उसका सम्मान खुद बखुद बढ़ जाता है…. धन यश शक्ति ज्ञान सब की दैवीय है, सिर्फ देवियां।

हमारे जीवन में कैसे धन प्राप्त करे अपने दरीदया को कैसे दूर करे, हमारी लक्ष्मी हमारी माँ है, हमारी बेटी है, हमारी पत्नी है, रास्ते पर चलती हर वो इस्त्री हमरे साथ हमारे आफिस में साथ काम करने वाली महिला, सब सम्मान के योग्य है, आप सब को माता लक्ष्मी माता दुर्गा और माता स्वरस्ती की निगह से देखना परम्भ करे, 90 दिन तक ये प्रयास करे, और अपने जीवन में परिवर्तन को महसूस करे… हमारे समाज में महिलाओं को शनेह और सुरक्षा और सम्मान की जरूरत है, और प्रकति के नियम ही आप कुछ भी देते हो कुछ भी बोते हो उसका फल प्राप्त होगा आप को, आप ने बाबुल बोए है, कांटे मिलेंगे आप ने फल का पेड़ लगया है, आप को फल मिलेगा, निर्णय आप का है, मेरी तरफ से उस श्री को शक्ति को और स्वरस्ती को नमन…

मिलते है अपने अगले वीडियो में तब तक के लिए माँ स्वरस्वती आप को ज्ञान की ओर ले जाये, माँ अम्बे आप को शक्ति सम्प्पन करे, और माँ लक्ष्मी आप के धनधान्य और कीर्ति में व्रद्धि करे… नमो अम्बे…

प्रथम अध्याय

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक संख्या दस एवं ग्यारह

श्लोक संख्या दस

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।१०।।

अपर्याप्तम्-अपरिमेय; तत्-वह; अस्माकम्-हमारी; बलम्-शक्ति; भीष्म-भीष्म पितामह द्वारा; अभिरक्षितम्-भलीभाँति संरक्षित; पर्याप्तम्-सीमीत; तु-लेकिन; इदम्-यह सब; एतेषाम्-पाण्डवों की; बलम्-शक्ति; भीम-भीम द्वारा; अभिरक्षितम्-भलीभाँति सुरक्षित ।

हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति संरक्षित होकर भी सीमित है।

यहाँ दुर्योधन तुलनात्मक अध्ययन कर रहा है अपनी और पाण्डु पुत्रो की सेना का, वो विशेष रूप से भीष्म पितामह की शक्ति को अपरिमेय बता रहा है, जो कि सर्वथा उचित भी है, यही पर वो भीष्म पितामह की शक्ति और सामर्थ्य की तुलना भीम से कर रहा है, और भीम की शक्ति को सीमित बता रहा है।

श्लोक संख्या ग्यारह

अयनेषु च सेर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।।११।।

अनयेषु-मोर्चो में; च-भी; सर्वेषु-सर्वत्र; यथा-भागम्-अपने अपने स्थानों पर; अवस्थिता:-स्थित; भीष्मम्-भीष्म पितामह की; एव-निश्चय ही; अभिरक्षन्तु-सहायता करनी चाहिए; भवन्तः-आप; सर्वे-सब के सब; एव हि-निश्चय ही।

अतएव सैन्यव्यूह में अपने अपने मोर्चे पर खड़े रहकर आप सभी भीष्म पितामह को पूरी पूरी सहायता दें।

भीष्म पितामह की प्रशंसा के बाद कूटनीतिज्ञ दुर्योधन नो सोचा कि कही ऐसा न हो को पितामह की प्रसंसा से, बाकी यौद्धा खुद को उपेछित न समझ के अतः कूटनीति का परिचय देते हुए बोला, पितामह अब वृद्ध हो चुके है, हो सकता है युद्ध में, किसी ओर ध्यान देते देते किसी ओर ध्यान रह जाये, तो उनकी इस वस्थता का लाभ शत्रु न उठा ले। अतः सब योद्धा अपने अपने स्थान पर बने रहे और व्यूह की रक्षा करे।

अभी तक आप को मैंने श्लोक का उच्चारण, श्लोक का हिंदी अनुवाद और श्लोक से संबंधित भूमिका से परचित करवाया है, अब वक्त है इन श्लोको का हमारे वर्तमान जीवन में क्या प्रभाव है, हमारे वर्तमान जीवन में इन श्लोको से क्या ज्ञान मिलता है।

जैसा कि पिछले वीडियो के अंत मे बताया था, की नीति निपुण, युद्ध कौशल निपुण, राजनीति निपुण दुर्योधन जब इतना कौशल था तो युद्ध क्योँ हार गया, आधा जवाब उसी वीडियो में था, और बाकी का बाकी का इसमे, दोनों को आईये जोड़ कर देखते है।

किसी भी सफलता के लिए प्रथम बात है, सम्पूर्ण मन से बिना किसी चीज को सोचे उस कार्य को करना, आप जो कार्य कर रहे है, क्या उसमे आप का पूर्ण मन लग रहा है, कही से वो कार्य आप को बोझिल तो नही लग रहा, अगर ऐसा है तो सफलता में संदेह है, आप शक्ति से तो कार्य करेंगे, लेकिन ह्रदय से नही, जैसे द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जानते थे, की वो दुर्योधन के साथ है, तो अधर्म के मार्ग पर है, और वो ये महाभारत का युद्ध सम्पूर्ण शक्ति से लड़ रहे थे, सम्पूर्ण ह्रदय से नही, परिणाम से आप सब अवगत है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात, “अभिमान” “अतिविश्वश” (ओवर कॉन्फिडेंस), अतिविश्वश दुनिया की सबसे बड़ी कमजोरी है, दुर्योधन भीष्म पितामह की वीरता का बखान कर रहा है वो सर्वथा उपयुक्त है, लेकिन साथ ही वो भीम को कम आक रहा है, ये उसका अतिविश्वश है, विश्वाश और अतिविश्वश में, एक धागे के बराबर फ़र्क़ होता है, और यही अति विश्वाश आप को विजेता बनने से रोक देता है।

हमे अपने जीवन में विश्वश को रखना है अतिविश्वश नही, किसी को कम आक कर अपने विश्वश को अतिविश्वश में नही बदलना है, और सम्पूर्ण ह्रदय से कार्य को करना है, जब सारी इन्द्रिय किसी कार्य में लग जाती है तो सफलता खुद ब खुद आप के माथे का ताज बन जाती है, और जब आप कार्य से पहले परिणाम की सोच लेते है तब आप सम्पूर्ण योग्यता से उस कार्य को नही कर पाते, और कार्य की सफतला में संदेह उत्पन्न हो जाता है। श्री कृष्ण तो सम्पूर्ण कारक थे इस युद्ध में लेकिन दुर्योधन की मानसिकता भी एक बड़ा कारण थी उसकी पराजय का।

आप ने इस श्लोक से क्या जाना क्या शिखा कृपया कॉमेंट कर के बताए, अगर आप के कोई प्रश्न हो तो जरूर पूछे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा से उसका उत्तर देने का प्रयत्न करूँगा, चलिए मिलते है अगके श्लोको के साथ और जीवनुपयोगी महान गीता के ज्ञान के साथ तब तक के लिए, अपना ख्याल रखे, स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा आप पर बनी रहे, राधे राधे….

प्रथम अध्याय

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक सप्तमं, अष्ठम एवं नवमं

सातवां श्लोक

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ।।७।।

अस्माकम्-हमारे; तु-लेकिन; विशिष्टाः-विशेष शक्तिशाली; ये-जो; तान्-उनको; निबोध-जरा जान लीजये, जानकारी प्राप्त कर लें; द्विज-उत्तम-हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; नायका:-सेनापति; मम-मेरी; सैन्यस्य-सेना के; संज्ञा-अर्थम्-सूचना के लिए; तान्-उन्हें; ब्रवीमि-बता रहा हूँ; ते-आपको ।

किन्तु हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! आपकी सूचना के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के विषय में बताना चाहूँगा जो मेरी सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं।

यह श्रीमदभगवदगीता का सातवां श्लोक है, इस में दुर्योधन अब अपने पक्ष के विरो से श्री द्रोणचार्य को परचित करवा रहा है।

आठवाँ श्लोक

भवान्भीष्मश्च कर्णचश्च कृपश्च समितिंजप: ।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ।।८।।

भवान्-आप; भीष्म:-भीष्म पितामह; च:-भी; कर्ण:- कर्ण; च-और; कृप:-कृपाचार्य; च-तथा; समितिञ्जयः-सदा संग्राम-विजयी; अश्वत्थामा-अश्वत्थामा; विकर्णः-विकर्ण; च-तथा; सौमदत्तिः-सौमदत्त का पुत्र; तथा-भी; एव-निशश्चय ही; च-भी ।

मेरी सेना में स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि हैं जो युद्ध में सदैव विजयी रहे हैं।

दुर्योधन ने उन सब महान और अतुलनीय महा योद्धाओ का परिचय दिया जिनकी शक्ति अपरमित है, अगर ये लोग युद्ध में है तो सिर्फ विजय श्री खुद आप के माथे पर तिलक लगाने को व्याकुल है, ये सब अति महान योद्धा है, जिकनी कृति जब तक ब्रह्मांड है तब तक रहेगी। दुर्योधन अगके बोलता है…

नवमं श्लोक

अन्ये च बहवः श्रुरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।

नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदाः ।।९।।

अन्ये-अन्य सब; च-भी; बहवः-अनेक; श्रुरा:-वीर; मत्-अर्थे-मेरे लिए; त्यक्त-जीविता:-जीवन का उत्सर्ग करने वाले; नाना-अनेक; शस्त्र-आयुध; प्रहाणा:-से युक्त; सर्वे-सभी; युद्ध-विशारदः-युद्ध विद्या में निपुण ।

ऐसे अन्य अनेक वीर भी हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए उद्यत हैं, वे विविध प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं और युद्धविद्या में निपुण है।

दुर्योधन कह रहा है, इनके अलावा (आठवे श्लोक में वर्णित नाम के अतिरिक्त) ऐसे और कई महायोद्धा है, जो दुर्योधन के लिए बिना एक पल सोचे अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार है।

जैसा कि पहले भी मैंने आप सब को बताया दुर्योधन कुशल रणनीतिज्ञ है और कुशल राजनितयज्ञ भी, अतः वो युद्ध से पहले अपने और अपने शत्रु का शक्ति परिचय कर रहा है और गुरु द्रोणाचार्य से करवा रहा है, तथा द्रोणाचार्य का उत्साहवर्धन कर रहा है, ये कुशल रणनीतिज्ञ की निशानी है।

अभी तक मैंने आप को इन सातवे आठवे और नवे श्लोक का उच्चारण, हिंदी में अनुवाद और श्लोक की भूमिका से संबंधित बात से अवगत करवाया है, इस श्लोक का हमारे जीवन में क्या प्रभाव है अब समय इस पर चिंतन करने का है, तो चलिए चलते है, आत्म चिंतन पर।

अगर आप के सामने कोई समस्या हो, जिसका आप को सामना करना है, तो पहले उस समस्या को जान ले, उस समस्या से निवारण के समय किन किन लोगों की चुनौती स्वीकार करनी होगी, उन लोगो की शक्ति और कमजोरी से यथा समर्थ अवगत हो ले, फिर इस समस्या में आप के पास या साथ कौन कौन है जो आप का सहयोग करेगा, उसकी छमता जो उसके कौशल को जांच परख ले, उर फिर निर्णय ले कि किस प्रकार उस समस्या को परास्त करने है, किसी भी समस्या के पहले उसे हल करने का यही मूल है यही मूल रहस्य है, आप एक बार पुनः चिंतन करे, जब आप अपनी किसी समस्या पर कभी पहले विजय प्राप्त किये है तो यही नीति करगर रही है।

उद्धरण के तौर पर लेते है, कोई गणित का प्रश्न ही जिसे आप को हल करना है, तो क्या आप कभी हिंदी वाले अध्यापक के पास जाएंगे??? नही आप गणित वाले अध्यापक के पास जाएंगे, क्योँकि आप ने समस्या का सही आकलन किया कि इस समस्या में आप का सहायक कौन हो सकता है, जैसे आप क्रिकेट खेलने गए, तो किस को कब बैटिंग पर उतरना है, कब किसी को बोलिंग करवानी है, किस को किस इस्थान पर फील्डिंग पर लगना है, ये निर्णय तब तक नही ले पाएंगे आप जब तक उसकी शक्ति से परचित न हो, और विजय तब तक नही नही होगी जब तक आप पूरे ह्रदय और पूरी रणनीति से उसका सामना न करें।

तो वक़्त आ गया है आप को अपनी रणनीति से कार्य करने का, इतना रणनीति में निपुण होने के वावजूद क्योँ दुर्योधन हार गया, बताते है आप को अगले वीडियो में, तब तक के लिए अपना ख्याल रखे, प्रसन्न रहे, स्वस्थ रहे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा आप पर बनी रहे, राधे राधे….

प्रथम अध्याय

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

चतुर्थ, पंचम एवं षष्ठम श्लोक

अत्र श्रुरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: ।।४।।

अत्-यहाँ; श्रुराः-वीर; महा-इषु-आसाः-महान धनुधर; भीम-अर्नुन-भीम तथा अर्जुन; समाः-के समान; युधि-युद्ध में; युयुधानः-युयुधानः; विराट:-विराट; च-भी; द्रुपदः-द्रुपद; च-भी; महा-रथः-महान योद्धा ।

इस सेना में भीम तथा अर्जुन के समान युद्ध करने वाले अनेक वीर धनुर्धर हैं-यथा महारथी युयुधान, विराट तथा द्रुपद

यह श्लोक प्रथम अध्याय का चौथा श्लोक है, इस श्लोक में, युद्ध में कौशल तथा राजनीति में कौशल रखने वाला दुर्योधन पाण्डु की तरफ से जो महा कुशल योद्धा है उनका वर्णन कर रहा है, बचपन से वो पाण्डु पुत्रो के साथ बड़ा हुआ अतः उसे इन दोनों की शक्ति का ज्ञान था, इसी वजह से इन महान शक्ति और युद्ध कला में महारत रखने वाले यौद्धाओं की तुलना भीम और अर्जुन से कर रहा था।

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ।।५।।

धृष्टकेतु:-धृष्टकेतु; चेकितान:-चेकितान; काशिराजः-काशिराज; च-भी; वीर्यवान्-अत्यंत शक्तिशाली; पुरुजित्-पुरुजित्; कुन्तिभोज:-कुन्तिभोज; च-तथा; शैब्य:-शैब्य; च-तथा; नर-पुङ्गवः-मानव समाज में वीर ।

इनके साथ ही धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज तथा शैब्य जैसे महान शक्तिशाली योद्धा भी हैं।

साथ ही दुर्योधन ने धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज तथा शैब्य जैसे महान शक्तिशाली योद्धा का वर्णन किया।

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यावान्

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: ।।६।।

युधामन्यु:-युधामन्यु; च-तथा; विक्रान्त:-पराक्रमी; उत्तमौजा:-उत्तमौजा; च-तथा; वीर्य-वान्-अत्यन्त शक्तिशाली; सौभद्र:-सुभद्रा का पुत्र; द्रौपदेयाः-द्रोपदी के पुत्र; च-तथा; सर्वे-सभी; एव-निश्चय ही; महा-रथा:-महारथी।

पराक्रमी युधामन्यु, अत्यन्त शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र तथा द्रौपदी के पुत्र-ये सभी महारथी है।

साथ ही दुर्योधन पराक्रमी युधामन्यु, अत्यन्त शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र तथा द्रौपदी के पुत्रो, की शक्ति की व्याख्या कर रहा है।

आज मैंने 3 श्लोक एक साथ एक वीडियो में बताए, मूलतः ये तीनो श्लोक एक ही है ये युद्ध मे आये पाण्डु पुत्रो के तरफ से लड़ने वाले, महारथी, माह योद्धा का परिचय, दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य से करवा रहा है, अतः इन तीनो श्लोको को एक साथ आप के सामने प्रस्तुत करने का कार्य किया, अभी तक मैंने आप को श्लोक का उच्चारण, और उसका हिंदी अनुवाद बताया अब वक्त है की, इन श्लोको से हमारे वर्तमान जीवन को क्या शिक्षा मिलती है इस पर चर्चा करने की।

दुर्योधन भले ही अधर्मी था, लेकिन वो महान योद्धा, कुशल रणनीतिकार, और कुशल राजनितयज्ञ था, दुर्योधन हमे यहाँ जो शिक्षा दे रहा है, वो हमारे जीवन के हर पल में यथार्त है, दुर्योधन यहाँ ऐसा कोई नही है कुरुक्षेत्र के मैदान में जिसको नही जानता है या इनमे से किसी को द्रोणाचार्य नही जानते हो, फिर क्योँ उनका परिचय दुर्योधन द्रोणाचार्य को दे रहा है??? जब आप इस बात को गहराई से सोचेंगे और श्रीमद भगवद गीता को आत्मसात करेंगे तो ये महान नीति महान ज्ञान आप को मिलेगा।

आप जब भी किसी कार्य के लिए जाए, हो सकता है आप मार्केंटिंग के बंदे हो, आप सरकारी जॉब में हो, आप का अपना व्यवसाय हो, आप गृहणी हो, लेकिन आप जब भी किसी कार्य पर जाए तो भले ही आप उस कार्य से सम्बंधित सभी चीजो को या सभी लोगो को भली भांति परचित हो फिर भी एक बार अच्छी तरह से पुनः हर एक बात का आकलन कर ले, लोगो हमेश वही रहते है, परिस्थितियां हमेशा एक सी नही होती, कभी किसी छोटी सी भी बात को इग्नोर न करे, हो सकता है वो एक छोटी बात आप को विफल कर दे, किसी भी कार्य को शांत मन से पूरी तरह एक बार समझ ले आप को अपनी रणनीति बनाने मे बहुत सहायता मिलेगी, और वो कार्य आप ने कितनी बार ही क्योँ न किया हो, लेकिन बिना योजना और रणनीति के बिना न करने जाए, सफलता आप की नीति पर तय करती है भाग्य पर नही, आप की नीति ही आप आप के विजय का मार्ग भी करेगी, ये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और हर दिन आना वाला ज्ञान है, इस पर तुरंत अमल लाये।

आज के श्लोक से ये ज्ञान निकल के बाहर आया, आप ने क्या समझा इन श्लोको से कृपया कॉमेंट कर के जरूर बातये, मैं आप के अनुभव से भी सीखने की कामना रखता हूँ, आज के सेशन को समाप्त करते है, मिलते है अगले सेशन में और बहुत महत्वपूर्ण सिख के साथ तब तक आप स्वस्थ रहे प्रसन्न रहे, अपना ख्याल रखे, श्री कृष्ण की कृपा आप पर बनी रहे… राधे राधे….

प्रथम अध्याय

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

तृतीय श्लोक

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण घीमता ।। १.३।।

पश्य-देखिए; एताम्-इस; पाण्डु-पुत्राणाम्-पाण्डु के पुत्रो की; आचार्य-हे आचार्य; महतीम्-विशाल; चमूम्-सेना को; व्यूढाम्-व्यवस्थिति; द्रुपद-पुत्रेण-द्रुपद के पुत्र द्वारा; तव-तुम्हारे; शिष्येण-शिष्य द्वारा; धी-मता-अत्यन्त बुद्धिमान ।

हे आचार्य ! पाण्डुपुत्रों की विशाल सेना को देखें, जिसे आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने इतने कौशल से व्यवस्थित किया है।

प्रथम अध्याय का तृतीय श्लोक है, इस श्लोक में परम राजनीति का ज्ञाता दुर्योधन, श्री द्रोणाचार्य जी के पास जाता है जो कि पाण्डु पुत्रो और कौरव दोनों के गुरु रहे है, सारी सस्त्र विद्या और युद्ध का ज्ञान दोनों पक्षो के महारथियों ने द्रोणाचार्य से ही प्रप्त की है, और उन्हें बोलता है, की पांडवो की विशाल सेना देखिए जिसकी द्रुपद पुत्र ने इतने कौशल से व्यवस्थित किया है, घृष्टधुम्न बहुत बुद्धिमान था तथा वो द्रोणचार्य का ही शिष्य था। यहाँ दुर्योधन को राजनितयज्ञ कहने का कारण है। आईये जानते है वो कारण।

द्रोणाचार्य के द्रुपद से कुछ राजनीतिज्ञ द्वेष थे, और इसका बदला लेते हुए उन्होंने द्रुपद को बुरी तरह परास्त किया था, राजा द्रुपद इस अपमान का बदला लेना चाहते थे, तो उन्होंने एक विशाल यज्ञ किया, जो कि पुत्र प्राप्ति के लिए था, इस यज्ञ का उद्देश्य ऐसा पुत्र प्राप्त करना था जो, द्रोणचार्य का वध कर सके, इस यज्ञ के फलस्वरूप उनके यहाँ घृष्टधुम्न का जन्म हुआ, गुरु द्रोणचार्य इस बात को जानते थे, की घृष्टधुम्न के जन्म का उद्देश्य क्या है, फिर भी उन्होंने घृष्टधुम्न को बिना किसी झिझक के सारे सैन्य रहस्य और सारे सस्त्र ज्ञान को दिया, और बुद्धिमान घृष्टधुम्न ने उसे एक योग्य शिष्य की तरह अर्जित किया।

दुर्योधन को इस लिए राजनीतिज्ञ कहा है मैंने इस जगह पर, क्योंकि राजनीति ये आज्ञा कभी नही देती की, आप शत्रु को शिक्षित करे।

दुर्योधन इस श्लोक मे द्रोणाचार्य को सैन्य इस्थति से कम अवगत करवा रहा था, ज्यादा उन्हें उल्हना दे रहा था, दुर्योधन अधर्मी था, बुद्धि और ह्रदय से भी बहुत छोटा था, द्रोणाचार्य और घृष्टधुम्न धर्म के मार्ग पर चलने वाले थे, और किसी भी अवस्था में धर्म के मार्ग से विरक्त नही होते थे। इसी का परिणाम रहा कि दोनों गुरु और शिष्य की परमपरा का पूर्ण निर्वाह किये सब कुछ जानते।

अभी तक मैंने आप लोगो को इस श्लोक का उच्चारण, अनुवाद और श्लोक की भूमिका से अवगत करवया है, हमारे वर्तमान के जीवन में इस श्लोक का क्या प्रभाव है आईये उस ओर चर्चा करते है।

मन जो है वो निर्मल जल की तरह पवित्र है, साफ है है, उसमे अगर स्वछ और पारदर्शी जल में कुछ रंग डाल दिया जाए तो पानी भी भी उसी तरह के रंग में रंग जाता है, अगर वो रंग धर्म का सत्य का है तो वो इसी रंग में रंग जाएगा, और अगर उसमे अधर्म और स्वार्थ डाला जाए वैसे ही होगा, इस श्लोक में तीन चरित्र है,

01. राजनीतिज्ञ दुर्योधन 02. गुरु द्रोणाचार्य 03. शिष्य घृष्टधुम्न ।

जब आप के मन में सिर्फ स्वार्थ होगा, ईर्ष्या होगी, अधर्म होगा तब आप नही जान पाएंगे कि कर्तव्य क्या है, क्या सही है क्या गलत, आप को सिर्फ अपने स्वार्थ से संबंधित चीजे दिखेंगी, जो आप के साथ होंगे उनको भी आप जाने अनजाने तिरस्कार करते रहेंगे, और इसका परिणाम होगा वो अपनी ताकत से आप के लिए कार्य करेंगे लेकिन ह्रदय से नही, और जब आप का मन पवित्र होगा तो एक दूसरे के मृत्यु के कारण होने वावजूद आप गुरु द्रोणा और शिष्य घृष्टधुम्न रहेंगे, स्वार्थ से उतपन्न हुई ईर्ष्या मनुष्य की दृष्टि पर पर्दा डाल देता है, उसे लगता है वो अपने बारे में बहुत उम्दा कर रहा है, लेकिन वो खुद के लिए निरंतर गड्ढा खोदता है, शांत मन ही आप को सही समझ दे सकता है, आता मन जो शांत करने का प्रयास करे।

आज के श्लोक से आप ने क्या जाना कृपया कमेंट कर के बताए, मिलते है फिर अगले श्लोक के साथ, अगले ब्लॉग में, तब तक मेरी प्रभु श्री कृष्ण से कामना है आप खुश रहे, स्वस्थ रहे, अपना ख्याल रखे, राधे राधे….

अध्याय एक

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

द्वितीय श्लोक

सञ्जय उवाच

दृष्ट़ा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा

आचार्यमुपसङृम्य राजा वचनब्रवीत् ।।२।

सञ्जयः उवाच-संजय ने कहा; दृष्ट़ा-देखकर; तु-लेकिन; पाण्डव-अनीकम्-पाण्डवों की सेना को; व्यूढम्-व्यूह रचना को; दुर्योधन:-राजा दुर्योधन ने; तदा-उस समय; आचार्यम्-शिक्षक (गुरु) के; उपसङृम्य-पास जा कर; राजा-राजा; वचनम्-शब्द; अब्रवीत्-कहा ।

संजय ने कहा – हे राजन ! पाण्डु पुत्रो द्वारा सेना की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु के पास गए और उसने ये सब्द कहे।

श्रीमदभागवतगीता के प्रथम अध्याय का द्वितीय श्लोक है, इसकी व्याख्या से पहले, एक बार पुनः श्री कृष्ण से, माँ स्वरस्ती से, सूर्य देवता से और महर्षि वेद व्यास से पार्थना है, की मेरी बुद्धि को इतनी शक्ति प्रदान करे कि मैं, प्रभु के श्री मुख से निकले महान ज्ञान को सही तरीके से आप के सामने प्रस्तुत कर पाऊँ, जय श्री कृष्ण… राधे राधे… सभी को नमन… एक प्रार्थना… विश्व मे शांति रहे… सभी लोगो मे प्रेम बना रहे…. सब का कल्याण हो…

ये गीत का द्वितीय श्लोक है, इसमें संजय ने धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर दिया, संजय ने कहा – दुर्योधन ने पाण्डु पुत्रो अर्थात, युधिष्टिर की सेना की व्यूह रचना देखी, और अपने गुरु के पास जा कर ये कहा (दुर्योधन ने क्या कहा वो अगले श्लोक मे है)।

जैसा कि आप को पहले श्लोक की व्यख्या के दौरान बताया था कि, धृतराष्ट्र के मन मे हमेशा से छोभ रहा कि वो पूर्ण राजा ना बन सका, और वो पुत्र मोह मे पूर्णतया धर्म के मार्ग से विरक्त हो चला था, उसे इस बात का पूर्णतया डर था कि कही, “कुरुक्षेत्र” की पावन भूमि के असर मे कुबुद्धि दुर्योधन किसी प्रकार की संधि न कर ले, इस बात को संजय भाप चुका था, की धृतराष्ट्र के प्रश्न पूछने का क्या आशय है, संजय महान ज्ञानी था, और अपने कर्तव्य अनुसार वो राज धर्म से भी बंधा था, आता उसने अपने राजा का उत्साह बढ़ते हुए ये श्लोक धृतराष्ट्र से कहा। अर्थत उसने समझाया कि “कुरुक्षेत्र” में दुर्योधन किसी प्रकार की संधि नही करने जा रहा है।

अच्छा पिछले ब्लॉग मे और इस बार भी मैंने दुर्योधन को “कुबुद्धि” कहा ! क्योँ???

दुर्योधन हर प्रकार से महान राजनितयज्ञ था, हो सकता है वो कुशल राजा भी हो, लेकिन वो कभी धर्म के मार्ग पर नही चला, जीवन पर्यंत वो सडयंत्र ही करता रहा, चाहे वो किसी से मित्रता का सडयंत्र हो, या बार बार पाण्डु पुत्रो की हत्या का सडयंत्र, दुर्योधन का मन कभी धर्म मे नही लगा, वैसे ही प्रभाव उसके भाइयों पर पड़ा, और जिसके पास ज्ञान था जो उसे सन्नमार्ग पर ला सकता था वो खुद “धर्म” और “अधर्म” मे “अधर्म” को आधार बना कर चल रहा था, वो क्या लाता उसे धर्म के मार्ग पर?

अभी तक मैंने आप को इस ब्लॉग मे द्वितीय श्लोक का उच्चारण, उसका हिंदी अनुवाद, और श्लोक की भूमिका बताई, श्लोक से हमारे जीवन मे क्या ज्ञान मिलता है, अब उस पर आप सब से चर्चा करते है।

मेरे अनुसार इस श्लोक का मूल ज्ञान है, की जब आप किसी भी व्यक्ति से ईर्ष्या करने लगते है, उस वक्त आप सब कुछ भूल जाते है, सदैव किसी अज्ञात चिंता मे खोये रहते है, जैसे कि धृतराष्ट्र, और आप अगर आप का मन शांत है, आप ज्ञानी है, तो आप संजय की भांति है, जो आप सारी विपरीत परिस्थिति में भी अपने धर्म से विरक्त नही होते, संजय का धर्म यहाँ अपने राजा को संतुष्ठ करना था, वो इस कार्य को करते हुए धर्म और अधर्म के कर्म पर पड़ने वाले दोनों प्रभाव से मुक्त था, आप के अपने जीवन मे आप के पिता जी, बॉस, या जो आप का मुखिया हो, उसे सही सलाह दे, किसी भी परिस्थिति मे उसका साथ दे, जैसे दोर्णाचार्य, कर्ण, संजय इत्यादि… जब युद्ध होता है उस से पहले सारे सलाह मशवरे किये जाते है, जब युद्ध आरंभ होता है, तब अपनी पूरी शक्ति से, जिनकी आप सरण मे हो या जो आप के मित्र हो उनका साथ दिया जाता है बिना सवाल किए….

मेरी समझ से इस श्लोक से मुझे मेरे जीवन के संबंधित यही ज्ञान मिला, आप लोगो ने इस श्लोक से क्या जाना क्या समझा, कृपया कमेंट कर के बताए, अगर आप के कोई प्रश्न है तो कृपया पूछे, मैं प्रभु श्री कृष्ण की कृपा से पूरा प्रयास करूंगा कि उसका यथोचित उत्तर दे सकू।

चलिए मिलते है अगले श्लोक मे, जानते है दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य से क्या कहा, तब तक के लिए आप सभी को राधे राधे… अपना ख्याल रखे, खुश रहे, स्वस्थ रहे, आप सब पर प्रभु श्री कृष्ण की कृपा बनी रहे… राधे राधे…

अध्याय एक

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

अध्याय प्रथम प्रथम श्लोक

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाचैव किमकुर्वत सज्जय।।१।।

धृतराष्ट्र: उवाच – राजा धृतराष्ट्र ने कहा; धर्म-क्षेत्रे – धर्मभूमि में; कुरु-क्षेत्रे – कुरुक्षेत्र नामक स्थान में; समवेता – एकत्र; युयुत्सवः – युद्ध करने की इच्छा से; मामकाः – मेरे पक्ष; पाण्डवा: – पाण्डु के पुत्रों ने; च – तथा; एव – निश्चय ही; किम – क्या; अकुर्वत – किया; सज्जय – हे संजय।

धृतराष्ट्र ने कहा – हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

ये गीता का प्रथम श्लोक है, इसकी व्याख्या प्रारम्भ करने से पहले, श्री कृष्ण को, सूर्य देवता, माँ सरस्वती और वेद व्यास को नमन करता हूँ, वो इतना ज्ञान और शक्ति दे कि आप लोगो तक सही शैली और उपयुक्त अर्थ के साथ प्रस्तुत कर पाऊँ। नमन… जय श्री कृष्ण, जय सूर्य देवता, जय माँ सरस्वती, जय वेद व्यास जी की… विश्व का कल्याण हो.. विश्व मे शांति स्थापित हो… राधे राधे…

यह गीत का प्रथम श्लोक है, इस श्लोक को धृतराष्ट्र ने कहा है, धृतराष्ट्र संजय से पूछ रहा है, की “युद्ध की इच्छा लिए कुरुक्षेत्र मे एकत्रित हुए मेरे और पाण्डु पुत्रो ने क्या किया?”

धृतराष्ट्र के मन मे एक छोभ रहा हमेशा, वो बड़ा था औय योग्य भी, लेकिन उसकी अन्धता के कारण उसके छोटे भाई पाण्डु को राज सिंघासन मिला, पाण्डु की मृत्यु के पश्चात, धृतराष्ट्र को कार्यवाहक राजा बनाया गया, और पाण्डु पुत्रो के वयस्क होने पर, पाण्डु पुत्रो के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्टिर को राजा बनाने का निर्णय लिया गया।

धृतराष्ट्र अपने साथ हुए इस कार्य को कभी स्वीकार नही कर सका और पुत्र मोह में ऐसा पड़ा कि आंखों के साथ साथ बुद्धि से भी अंधा हो गया। कई बार उसने और कुबुद्धि दुर्योधन ने छल से पाण्डु पुत्रो को मारने का प्रयत्न किया, लेकिन नियति और प्रभु श्री कृष्ण की कृपा से वो हमेश बच निकले।

धृतराष्ट्र जनता था उसका मार्ग धर्म का नही है, पाण्डु पुत्रो ने हमेशा युद्ध टालने की कोसिस की, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन पर, और युद्ध भी श्री कृष्ण के मार्गदर्शन मे किया, वो कृष्ण के अधीन थे, अंत मे पाँच गांव तक दे देने पर वो संतुष्ठ होने का प्रस्ताव दिया, लेकिन कुबुद्धि दुर्योधन के एक सुई के बराबर तक भूमि न देने की बात पर उन्हें ये युद्ध करना पड़ा।

अभी तक इस श्लोक का अर्थ और भूमिका का वर्णन किया है, अब इस श्लोक का हमारे जीवन से क्या सम्बद्ध है, मैं अपने अनुसार आप के सामने इसका व्यख्यान करता हूँ। एक बार प्रेम से बोले राधे राधे…

धृतराष्ट्र जनता था वो गलत है, और जब आप गलत होते है तो आप के ह्रदय मे शंका होती है, यही शका धृतराष्ट्र के मन मे थी, वो जनता था कि संधि के सारे प्रयास खत्म हो चुके है, अब युद्ध होना निश्चित है, और कुरुक्षेत्र की पावन भूमि के असर में कही दुर्योधन का विचार परवर्तित न हो जाये… यही वो शंका है हमारे मन में, जब हम किसी कार्य को जानते है वो गलत होता है, तो कई प्रकार की शंकाये हमे घेर लेती है।

ऐसे वक्त मे हमे अपने ह्रदय की सुननी चाहिए, ह्रदय ईश्वर की प्रेरणा से ओत प्रोत है, वो आप को इशारा देता है, आभास करवता है, जो आप करने जा रहे है, वो कैसे कार्य है…

जैसे गंगा की एक बूंद भी गंगा है, वैसे ही आप उस सर्वशक्तिशाली ईश्वर श्री कृष्ण के स्वरूप हो, वो आप के हम सब के अंदर है, और वो हर पल हमे इस बात का आभास दिलाता है, क्या धर्म है क्या अधर्म…

उम्मीद करता हूँ आप सभी को ये मेरा व्यख्यान पसंद आया होगा, आप सभी से अनुरोध है अपने अनुभव, अपने प्रश्न कृपया मेरे साथ साझा करें… मैं आप सब के साथ पुनः गीता का अध्यन करना चाहता हूँ, और अगर आप के कोई प्रश्न है, तो अपनी पूरी शक्ति, विचार, और प्रभु श्री कृष्ण के कृपा से देने की कोसिस करूँगा, कल फिर मिलते है, दूसरे श्लोक के साथ, तब तक आप स्वस्थ रहे खुश रहे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा आप पर बनी रहे राधे राधे….

An Introduction of Srimad Bhagwad Geet by My Point Of View. (श्रीमदभगवदगीता का परिचय मेरे नज़रिए से।)

गीता ये वो परिचय है जो सभी से परिचित है, और इसे मैं अपने तरीके से आप सब से परिचित करवाना चाहता हूँ….

जय श्री कृष्ण… राधे राधे…. मैं अनिल कुमार दुबे, आप सभी का स्वागत और अभिनंदन करता हूँ, आप के अपने इस चैनल इस ब्लॉग मैं।

गीता के परिचय से पहले मैं आप को दो और लोगो से परिचित करवता हूँ पहले, दोनों व्यक्ति भारतीय मूल के ब्रिटेन के निवासी है, और दोनों किसी एक बात से, किसी एक तार से जुड़े हुए है… वो तार वो माध्यम है गीता… एक व्यक्तित्व है, श्री मान ऋषि सुनक, दूसरी है, सुश्री प्रीति पटेल, ये दोनों गीता नामक उस पवन धागे से बंधे है जो जीवन को आप के जीवन को सफलताओ के अनुकूल बना देता है श्री ऋषि सुनक आज ब्रिटेन के वित्तमंत्री है, और सुश्री प्रीति पटेल जी ग्रहमंत्री… राधे राधे….

हा तो आते है अपने मूल टॉपिक पर, गीता का परिचय मेरे नज़रिए से… श्रीमदभगवदगीता जगत के पालन करता श्री विष्णु जी के सम्पूर्ण अवतार श्री कृष्ण के मुख से अवतरित हुई, वैसे तो हम सभी जानते है गीता अर्जुन को श्री कृष्ण ने सुनाई और गीता का ज्ञान दिया, लेकिन क्या आप को पता है गीता के ज्ञान का प्रथम लाभ किसी को मिला, नही वो अर्जुन नही है, वो हमारे जीवन मे प्रकाश लेन वाले श्री सूर्य जी महाराज है, हा श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम गीता का ज्ञान सूर्य देवता को दिया था… अर्जुन को तब दिया जब अर्जुन इस महान ज्ञान को हासिल करने के एकदम योग्य हो गए थे या उन्हें इस ज्ञान की सबसे अधिक आवश्यकता थी…. इसके अलावा गीता सर्वप्रथम दो और लोगो ने सुनी, एक थे संजय और दूसरे धृतराष्ट्र…

हमारे महान गणितज्ञ श्रीमान आर्यभट्ट जी के अनुसार महाभारत का युद्ध 3137 ईशा पूर्व हुआ था, वर्तमान मे शक संवत 1940 चल रहा है, तो लगभग आज से 5116 वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध के मैदान, परमपूज्य और देवताओं के लिए भी आकर्षण और पाने की कामना वाली भूमि जो हरियाणा मे इस्थित है, “कुरुक्षेत्र”… कुरुक्षेत्र मे हुआ था। वो युद्ध कम यज्ञ ज्यादा था, पाप को मिटाने का यज्ञ, वातावरण को पुण्य की खुश्बू से सुगंधित करने का यज्ञ… छल पर निश्छल की विजय का यज्ञ….और इसको सम्पन्न श्री कृष्ण ने करवाया….

इस गणित के अनुसार गीत का पाठ आज से 5116 वर्ष पूर्व किया गया… श्री कृष्ण ने अर्जुन को किया… तिथि एकादशी थी… संभवत वो दिन रविवार था…यह ज्ञान लगभग 45 मिनिट तक श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया… गीता महाभारत का एक अंग है एक हिस्सा है, गीता महाभारत मे भीष्म पर्व मे अति है…

गीता मे कुल 700 श्लोक है… जिसमे से 1 श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा, 40 संजय ने, 85 अर्जुन ने और 574 श्लोक श्री कृष्ण ने कहे….

गीता प्रारम्भ होने से पहले ही जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान दे देती है, गीता कहती है, अगर आप ध्यान से किसी भी बात को सुनते समझते है, मतलब आप अच्छे श्रोता बनते है तो आप उस समस्या का उस प्रश्न का हल निकालने मे सक्षम होंगे, जैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन के 85 प्रश्न श्लोक ध्यान से सुने और 574 श्लोक मे उत्तर दिए, अर्थात गीता का पहला ज्ञान किसी की भी बात को पूरी सुने बिना उत्तेजित हुए तभी आप उस बात को समझ के उसका जवाब दे पाएंगे….

गीता का ज्ञान अर्जुन को श्री कृष्ण ने क्योँ दिया???? जिस समय अर्जुन युद्ध के मैदान मे थे, वो अपने मार्ग से भटक गए, अपने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए और उनका मन बहुत गति से वैराग्य की ओर बह चला… इस अवस्था को जान कर श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया और अपने कर्तव्य पथ पर पुनः ले कर आये… गीता ने सर्वप्रथम अर्जुन के जीवन को सार्थक किया… अनंत का मतलब यही है हमे जहाँ से प्रारंभ मानना है मान ले, मैं इसे अर्जुन के जीवन को सफल बनाने से मान रहा हूँ… और आज अपने और आप के जीवन को सफल करने का माध्यम देख रहा हूँ…. गीता वो गंगा है जिसमे नहाने के बाद, कर्मो के जाले खुद ब खुद जल जाते है, और श्री कृष्ण का मार्ग मिलता है…. राधे राधे… जय श्री कृष्ण…

आप सभी का बहुत बहुत आभार… आप ने मेरे इस ब्लॉग को अपना बहुमूल्य समय दिया… मिलते है अगले लेख मे, श्लोक के साथ, 21 फरबरी को… तब तक के लिए अपना ख्याल रखे, खुश रहे, स्वस्थ रहे…जय श्री कृष्ण राधे राधे…..

Introduction (परिचय)

जय श्री कृष्ण… राधे राधे…

नमस्कार मैं अनिल कुमार दुबे, निवासी कानपुर उत्तर प्रदेश, आप सभी लोगो का स्वागत करता हूँ अपने इस ब्लॉग मे….

बहुत समय से मैं गीता को पढ़ने और सुनने का प्रयास कर रहा था, लेकिन कोई ऑनलाइन ऐसा संग्रह मैं नही खोज पाया, जिसमे वीडियो या ब्लॉग मैं सारे गीता के श्लोक हो, उन श्लोको का वर्णन हो अनुवाद हो, सरल भासा मे हो जिस से मैं आसानी से समझ सकू, बहुत खोज के बाद भी मैं नही ऐसा कुछ खोज पाया, वही से मुझे इस बात की प्रेरणा मिली, और इस विचार ने जन्म लिया और मैंने निर्णय किया कि, मेरे जैसे सभी जिज्ञाशू जो गीता का पाठ करना चाहते है, उन सब तक पहुँचने की कोसिस करूँगा, कार्य बहुत बड़ा है, मेरा ज्ञान इस कार्य के आगे भूसे के ढेर मे पड़ी सुई के समान है, मैं अपने इस कार्य को श्री कृष्ण पर छोड़ता हूँ, उनकी जितना प्रेरणा होगी, जैसा आशीर्वाद होगा वैसे ही शक्ति मिलेगी इस कार्य को सम्पूर्ण करने मे….

आज प्रथम ब्लॉग था, इस मे अपने और अपने उद्देश्य के बारे मे बताया, एक और ब्लॉग आएगा, जिसमे गीता की डिटेल्स दी जाएगी, फिर 21 फरबरी महा शिवरात्रि से लगता हर रोज एक श्लोक का वर्णन शुरू होगा…. आज के लिए राधे राधे….

आप हमें हमारे नीचे दिए गए लिंक पर भी फॉलो कर सकते है…

Follow Me on:
https://www.facebook.com/shrimadbhagwadgeeta.geeta
https://www.instagram.com/shrimadbhagwadgeeta/
https://twitter.com/GeetaShrimad