अध्याय एक

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरीक्षण

द्वितीय श्लोक

सञ्जय उवाच

दृष्ट़ा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा

आचार्यमुपसङृम्य राजा वचनब्रवीत् ।।२।

सञ्जयः उवाच-संजय ने कहा; दृष्ट़ा-देखकर; तु-लेकिन; पाण्डव-अनीकम्-पाण्डवों की सेना को; व्यूढम्-व्यूह रचना को; दुर्योधन:-राजा दुर्योधन ने; तदा-उस समय; आचार्यम्-शिक्षक (गुरु) के; उपसङृम्य-पास जा कर; राजा-राजा; वचनम्-शब्द; अब्रवीत्-कहा ।

संजय ने कहा – हे राजन ! पाण्डु पुत्रो द्वारा सेना की व्यूह रचना देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु के पास गए और उसने ये सब्द कहे।

श्रीमदभागवतगीता के प्रथम अध्याय का द्वितीय श्लोक है, इसकी व्याख्या से पहले, एक बार पुनः श्री कृष्ण से, माँ स्वरस्ती से, सूर्य देवता से और महर्षि वेद व्यास से पार्थना है, की मेरी बुद्धि को इतनी शक्ति प्रदान करे कि मैं, प्रभु के श्री मुख से निकले महान ज्ञान को सही तरीके से आप के सामने प्रस्तुत कर पाऊँ, जय श्री कृष्ण… राधे राधे… सभी को नमन… एक प्रार्थना… विश्व मे शांति रहे… सभी लोगो मे प्रेम बना रहे…. सब का कल्याण हो…

ये गीत का द्वितीय श्लोक है, इसमें संजय ने धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर दिया, संजय ने कहा – दुर्योधन ने पाण्डु पुत्रो अर्थात, युधिष्टिर की सेना की व्यूह रचना देखी, और अपने गुरु के पास जा कर ये कहा (दुर्योधन ने क्या कहा वो अगले श्लोक मे है)।

जैसा कि आप को पहले श्लोक की व्यख्या के दौरान बताया था कि, धृतराष्ट्र के मन मे हमेशा से छोभ रहा कि वो पूर्ण राजा ना बन सका, और वो पुत्र मोह मे पूर्णतया धर्म के मार्ग से विरक्त हो चला था, उसे इस बात का पूर्णतया डर था कि कही, “कुरुक्षेत्र” की पावन भूमि के असर मे कुबुद्धि दुर्योधन किसी प्रकार की संधि न कर ले, इस बात को संजय भाप चुका था, की धृतराष्ट्र के प्रश्न पूछने का क्या आशय है, संजय महान ज्ञानी था, और अपने कर्तव्य अनुसार वो राज धर्म से भी बंधा था, आता उसने अपने राजा का उत्साह बढ़ते हुए ये श्लोक धृतराष्ट्र से कहा। अर्थत उसने समझाया कि “कुरुक्षेत्र” में दुर्योधन किसी प्रकार की संधि नही करने जा रहा है।

अच्छा पिछले ब्लॉग मे और इस बार भी मैंने दुर्योधन को “कुबुद्धि” कहा ! क्योँ???

दुर्योधन हर प्रकार से महान राजनितयज्ञ था, हो सकता है वो कुशल राजा भी हो, लेकिन वो कभी धर्म के मार्ग पर नही चला, जीवन पर्यंत वो सडयंत्र ही करता रहा, चाहे वो किसी से मित्रता का सडयंत्र हो, या बार बार पाण्डु पुत्रो की हत्या का सडयंत्र, दुर्योधन का मन कभी धर्म मे नही लगा, वैसे ही प्रभाव उसके भाइयों पर पड़ा, और जिसके पास ज्ञान था जो उसे सन्नमार्ग पर ला सकता था वो खुद “धर्म” और “अधर्म” मे “अधर्म” को आधार बना कर चल रहा था, वो क्या लाता उसे धर्म के मार्ग पर?

अभी तक मैंने आप को इस ब्लॉग मे द्वितीय श्लोक का उच्चारण, उसका हिंदी अनुवाद, और श्लोक की भूमिका बताई, श्लोक से हमारे जीवन मे क्या ज्ञान मिलता है, अब उस पर आप सब से चर्चा करते है।

मेरे अनुसार इस श्लोक का मूल ज्ञान है, की जब आप किसी भी व्यक्ति से ईर्ष्या करने लगते है, उस वक्त आप सब कुछ भूल जाते है, सदैव किसी अज्ञात चिंता मे खोये रहते है, जैसे कि धृतराष्ट्र, और आप अगर आप का मन शांत है, आप ज्ञानी है, तो आप संजय की भांति है, जो आप सारी विपरीत परिस्थिति में भी अपने धर्म से विरक्त नही होते, संजय का धर्म यहाँ अपने राजा को संतुष्ठ करना था, वो इस कार्य को करते हुए धर्म और अधर्म के कर्म पर पड़ने वाले दोनों प्रभाव से मुक्त था, आप के अपने जीवन मे आप के पिता जी, बॉस, या जो आप का मुखिया हो, उसे सही सलाह दे, किसी भी परिस्थिति मे उसका साथ दे, जैसे दोर्णाचार्य, कर्ण, संजय इत्यादि… जब युद्ध होता है उस से पहले सारे सलाह मशवरे किये जाते है, जब युद्ध आरंभ होता है, तब अपनी पूरी शक्ति से, जिनकी आप सरण मे हो या जो आप के मित्र हो उनका साथ दिया जाता है बिना सवाल किए….

मेरी समझ से इस श्लोक से मुझे मेरे जीवन के संबंधित यही ज्ञान मिला, आप लोगो ने इस श्लोक से क्या जाना क्या समझा, कृपया कमेंट कर के बताए, अगर आप के कोई प्रश्न है तो कृपया पूछे, मैं प्रभु श्री कृष्ण की कृपा से पूरा प्रयास करूंगा कि उसका यथोचित उत्तर दे सकू।

चलिए मिलते है अगले श्लोक मे, जानते है दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य से क्या कहा, तब तक के लिए आप सभी को राधे राधे… अपना ख्याल रखे, खुश रहे, स्वस्थ रहे, आप सब पर प्रभु श्री कृष्ण की कृपा बनी रहे… राधे राधे…