प्रथम अध्याय

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक संख्या दस एवं ग्यारह

श्लोक संख्या दस

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।१०।।

अपर्याप्तम्-अपरिमेय; तत्-वह; अस्माकम्-हमारी; बलम्-शक्ति; भीष्म-भीष्म पितामह द्वारा; अभिरक्षितम्-भलीभाँति संरक्षित; पर्याप्तम्-सीमीत; तु-लेकिन; इदम्-यह सब; एतेषाम्-पाण्डवों की; बलम्-शक्ति; भीम-भीम द्वारा; अभिरक्षितम्-भलीभाँति सुरक्षित ।

हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति संरक्षित हैं, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति संरक्षित होकर भी सीमित है।

यहाँ दुर्योधन तुलनात्मक अध्ययन कर रहा है अपनी और पाण्डु पुत्रो की सेना का, वो विशेष रूप से भीष्म पितामह की शक्ति को अपरिमेय बता रहा है, जो कि सर्वथा उचित भी है, यही पर वो भीष्म पितामह की शक्ति और सामर्थ्य की तुलना भीम से कर रहा है, और भीम की शक्ति को सीमित बता रहा है।

श्लोक संख्या ग्यारह

अयनेषु च सेर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।।११।।

अनयेषु-मोर्चो में; च-भी; सर्वेषु-सर्वत्र; यथा-भागम्-अपने अपने स्थानों पर; अवस्थिता:-स्थित; भीष्मम्-भीष्म पितामह की; एव-निश्चय ही; अभिरक्षन्तु-सहायता करनी चाहिए; भवन्तः-आप; सर्वे-सब के सब; एव हि-निश्चय ही।

अतएव सैन्यव्यूह में अपने अपने मोर्चे पर खड़े रहकर आप सभी भीष्म पितामह को पूरी पूरी सहायता दें।

भीष्म पितामह की प्रशंसा के बाद कूटनीतिज्ञ दुर्योधन नो सोचा कि कही ऐसा न हो को पितामह की प्रसंसा से, बाकी यौद्धा खुद को उपेछित न समझ के अतः कूटनीति का परिचय देते हुए बोला, पितामह अब वृद्ध हो चुके है, हो सकता है युद्ध में, किसी ओर ध्यान देते देते किसी ओर ध्यान रह जाये, तो उनकी इस वस्थता का लाभ शत्रु न उठा ले। अतः सब योद्धा अपने अपने स्थान पर बने रहे और व्यूह की रक्षा करे।

अभी तक आप को मैंने श्लोक का उच्चारण, श्लोक का हिंदी अनुवाद और श्लोक से संबंधित भूमिका से परचित करवाया है, अब वक्त है इन श्लोको का हमारे वर्तमान जीवन में क्या प्रभाव है, हमारे वर्तमान जीवन में इन श्लोको से क्या ज्ञान मिलता है।

जैसा कि पिछले वीडियो के अंत मे बताया था, की नीति निपुण, युद्ध कौशल निपुण, राजनीति निपुण दुर्योधन जब इतना कौशल था तो युद्ध क्योँ हार गया, आधा जवाब उसी वीडियो में था, और बाकी का बाकी का इसमे, दोनों को आईये जोड़ कर देखते है।

किसी भी सफलता के लिए प्रथम बात है, सम्पूर्ण मन से बिना किसी चीज को सोचे उस कार्य को करना, आप जो कार्य कर रहे है, क्या उसमे आप का पूर्ण मन लग रहा है, कही से वो कार्य आप को बोझिल तो नही लग रहा, अगर ऐसा है तो सफलता में संदेह है, आप शक्ति से तो कार्य करेंगे, लेकिन ह्रदय से नही, जैसे द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जानते थे, की वो दुर्योधन के साथ है, तो अधर्म के मार्ग पर है, और वो ये महाभारत का युद्ध सम्पूर्ण शक्ति से लड़ रहे थे, सम्पूर्ण ह्रदय से नही, परिणाम से आप सब अवगत है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात, “अभिमान” “अतिविश्वश” (ओवर कॉन्फिडेंस), अतिविश्वश दुनिया की सबसे बड़ी कमजोरी है, दुर्योधन भीष्म पितामह की वीरता का बखान कर रहा है वो सर्वथा उपयुक्त है, लेकिन साथ ही वो भीम को कम आक रहा है, ये उसका अतिविश्वश है, विश्वाश और अतिविश्वश में, एक धागे के बराबर फ़र्क़ होता है, और यही अति विश्वाश आप को विजेता बनने से रोक देता है।

हमे अपने जीवन में विश्वश को रखना है अतिविश्वश नही, किसी को कम आक कर अपने विश्वश को अतिविश्वश में नही बदलना है, और सम्पूर्ण ह्रदय से कार्य को करना है, जब सारी इन्द्रिय किसी कार्य में लग जाती है तो सफलता खुद ब खुद आप के माथे का ताज बन जाती है, और जब आप कार्य से पहले परिणाम की सोच लेते है तब आप सम्पूर्ण योग्यता से उस कार्य को नही कर पाते, और कार्य की सफतला में संदेह उत्पन्न हो जाता है। श्री कृष्ण तो सम्पूर्ण कारक थे इस युद्ध में लेकिन दुर्योधन की मानसिकता भी एक बड़ा कारण थी उसकी पराजय का।

आप ने इस श्लोक से क्या जाना क्या शिखा कृपया कॉमेंट कर के बताए, अगर आप के कोई प्रश्न हो तो जरूर पूछे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा से उसका उत्तर देने का प्रयत्न करूँगा, चलिए मिलते है अगके श्लोको के साथ और जीवनुपयोगी महान गीता के ज्ञान के साथ तब तक के लिए, अपना ख्याल रखे, स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे, प्रभु श्री कृष्ण की कृपा आप पर बनी रहे, राधे राधे….