सम्बंध

सम्बंध… रिलेशनशिप ये वो शब्द है जो हमारे इस दुनिया में आने से पहले हमसे जुड़ जाता है और हमारे जाने के बाद भी ये हमसे जुड़ा रहता है, पूरे जीवन हैम कुछ भी कर रहे हो, बस इसी शब्द के साथ हर पल बिताते हैं!!!

सम्बंध के अंनत स्वरूप है, लेकिन आज मैं जिस पर लिखना चाह रहा हूँ अपने विचार प्रकट करना चाह रहा हूँ वो हमारे सामान्य जीवन का अति महत्वपूर्ण अंग है, सम्बंध पति पत्नी के, तो चलते है इस सफर पर मेरे नजरिये और प्रेणा से।

बात शुरू करता हूँ एक महान संत कि एक छोट सी पढ़ी कहनीं से, एक बार एक संत अपने घर के बाहर दोपहर को बैठे कुछ कार्य कर रहे थे, तभी एक महिला अपनी परेशानी लिए आती है, कहती है हे पूज्य देव मेरे परिवार में मेरी और मेरे पति की नही बनती… हममें अक्सर विवाद हो जाता है, क्या है समाधान इसका कृपया मार्गदर्शन करें, उस संत ने लगभग उनकी बातों को अनसुना करते हुए अपनी पत्नी को आवाज़ दी, “सुनती हो जरा दीपक ले आना”, कुछ समय उपरांत उनकी धर्मपत्नी दीपक ले कर आ गयी, संत ने दीपक लिए फूंक मारी बुझा दिया और वापस पत्नी को दे दिया, उनकी पत्नी से बुझा दीपक लिया और बड़े शांत मन से चली गयी, अब संत ने अपना कार्य रोक, और उस महिला से कहा, क्या देखा?? महिला बड़ी थोड़ी नाराज सी अवस्था में बोली हे देव जब आप को दीपक का काम नही तो अपबे अपनी पत्नी को क्योँ काष्ठ दिया, पता नही वो किस काम में व्यस्त हो और आप की आवाज सुन के वो काम छोड़ आप के लिए दीपक ले कर आई और आप ने उसे फूक मेरी और बुझा के वापस दे दिया क्या ये उचित वयवहार है, और आप ने मेरी परेशानी तक को नही सुना न समाधान दिया!!!!

अब उस पूज्य संत ने मुस्कुराते हुए कहा, तुम्हारी ही समस्या का निदान दिया है तुम्हे, जब मैंने अपनी पत्नी से कहा दीपक ले आओ हो सकता है वो कोई अनिवार्य कार्य कर रही होगी, या हो सकता है कार्य से थक के आराम को गयी हो, लेकिन मेरे आवाज लगतार की दीपक ले आओ, वो तुरंत दीपक को रौशन कर के लर आयी, “क्योँकि उसे पूर्ण विश्वाश था, की मैन उस से दीपक किसी विशेष कार्य को लाने को कहा होगा”, “जब मैंने दिया को बुझा दिया तब भी उसे मुझ पर पूर्ण विश्वाश था कि जिस विशेष प्रयोजन से उसे दीपक के साथ बुलाया था वो पूर्ण हो गया” और वो वापस उसी विशवास और प्रेम के साथ जा कर अपने उस कार्य मैं लग गयी जिसे वो छोड़ जे आयी थी, यही विश्वाश एक पति पत्नी होना चाहिए, जब ये विश्वाश होगा वह प्रेम भी होगा और शांति भी।

क्या क्या हम अपने जीवन में अपने पति या पत्नी पर इतना विश्वश करते है??? या सिर्फ एक दूसरे को कैसे धोखा दे इसके लिए प्रयासरत रहते है, और फिर वहां से शुरू होते है पति पत्नि के जोक्स, उसमें पड़ोसन को लाया जाता है, और वहाँ से हमारी मानसिकता पर प्रहार होता है, एक ऐसा रिश्ता जिसके साथ धर्म जुड़ा है, धर्मपत्नी… मतलब जीवन में सबसे बड़ा धर्म और पति पत्नी का धर्म एक दूसरे के प्रति??? आज सिर्फ जोक्स बन कर राह गया है, रोमान्स सिर्फ कुछ दिन रहता है लेकिन विश्वश ऐसी चीज है जो जीवन पर्यन्त रहती है… आज खुद से पूछे आप को पूरी दुनिया के लिए नही लेकिन क्या आप अपनी पत्नी के लिए वो संत हो पाए है क्या, क्या आप अपने पति के लिए वो पत्नी बन पाई है क्या??? की सिर्फ आधुनिकता में खुद को और अपनी पत्नी को सिर्फ रोज नए नए तरीके से धोखा देने का प्रयत्न कर रहे है, धोखा सिर्फ चारित्रिक नही होता हमारे दिनचर्या के हर कार्य मैं हो सकता है।

विचार आप को करना है पति पत्नी के भद्दे जोक्स पर हस रहे है आप या आप खुद पर, भाभी जी घर पर है से कही आप बेवजह अपने चरित्र का पतन तो नही कर रहे है, कही आप अतिवादी मानसिकता के गुलाम तो नही होते जा रहे है…

अंतिम वाक्य लेकिन महत्वपूर्ण, विवाह हमारे समाज की सबसे मजबूत नींव थी, जिसे आज तक भी कोई हिला नही पाया, लेकिन ऐसा ही रहा तो क्या ये इतनी मजबूत रहेगी, जो सात जन्मों का बंधन होता था, आज कड़वाहट और इस्थिति अलग होने तक आ गयी, क्योँकि हमने वही विवाह को कॉन्ट्रेक्ट मान लिया, शारीरिक सुख का… एक घर में रहते हुए भी हम में कोल्ड वॉर चलता रहता है, क्योँ क्योँकि हम अंदर से इतनी कुपोषित और खुद से नाराज है क्या देंगे अपने जीवनसाथी को, सोचना कही तुम्हारा रिस्ता भी सिर्फ शारीरिक ही बन के राह गया है?????

Leave a comment